Tuesday, July 17, 2012

ग़मगीन

उनकी आँखों में एक सागर बसता है,
पर दिखाई नहीं देता हर किसी को,  
जो ना हो भरोसा इस बात पे तो
सिर्फ दो कड़वे शब्द बोल के देख लो..

नहीं ज़रुरत किसी तीर या तलवार की,
नहीं ज़रुरत किसी ग़मगीन मंज़र की,
सिर्फ एक तेज़ धार जुबां काफी है,
आजमाने को जो बात मैंने कही है..

बात जब सीधे दिल पे लगी होगी,
तो बेसाख्ता उनकी आँखें भर आयेंगी,  
और बाँध कब सागर को रोक सका है,
जो अश्कों को पलकें रोक पाएंगी?

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और तब उन्हें लगेगा बस रोते ही जाएँ,
शायद उसके बाद कुछ सुकून आयेगा, 
बस किसी तरह वो दिल में बसी सारी बातें, 
शायद उन अश्कों के साथ ही रवां हों जाएँ.

मगर वो बस एक ख़याल ही है,
कि सुकून मिलेगा चंद आंसूओं के बह जाने से,
मगर और कुछ तो बस में है नहीं,
तो थोड़ी देर और रो लिया जाए.

Sunday, June 17, 2012

प्राण अथवा ज्ञान?


एक रास्ता है जिधर से मुझे रोज़ निकलना होता है
हज़ारों लोग वहां से रोज़ गुज़रते होंगे
लेकिन एक बूढ़ी औरत वहीँ खड़ी रहती है एक लाठी के सहारे,
इस सोच में कि आज जाने लोग उसे क्या देंगे.

वो सबके सामने हाथ फैलाती है
कुछ लोग अनदेखा कर आगे निकल जाते हैं, कुछ जेबें टटोलते हैं,
कुछ वितृष्णा से देखते हैं और कुछ लोग एक सिक्का दे देते हैं
उनके लिए वो हाथ जोड़ एहसान मानती है.

ये पता नहीं जीने की चाह है या फिर कोई बेबसी,
जिसके सामने आत्मसम्मान की मृत्यु हो गयी,
किस तरह मन को समझाया होगा उसने पहली बार हाथ फैलाने को,
जब  भूख की ज्वाला हर तरह से बेकाबू हो गयी.

क्या है ये प्राण शक्ति जो हर जंतु  के अन्दर  है,
जो कि एक समान है चाहे बाह्य तन हो सूक्ष्म या विशाल,
यदि जीवन के चले जाने का भय सामने आ जाए,
तो रहता सिर्फ उसे बचाने का प्रयत्न और बाकी सब बेकार.

मनुष्य जिसे अपने सर्वाधिक विकसित होने का दंभ है,
अंततः वो भी उस प्राणशक्ति का ही एक दास है,
भिखारियों से मूंह फेरने वाला भी कभी भूख से व्याकुल होता है ,
पर नहीं समझता कि उसके अन्दर भी वही आदिम एहसास है.

यदि हर कोई अपने जीवन कि रक्षा करने पे मजबूर है,
तो प्रश्न है कि क्या सही और गलत की एक परिभाषा है,
यदि किसी में वो आत्मज्ञान है जो इस प्राणशक्ति से ऊपर है,
वो मूर्ख है या उसके कारण ही मनुष्यता के लिए कोई आशा है?

Thursday, June 14, 2012

व्याकुलता

किसे बताऊँ कि ह्रदय आकुल क्यूँ है ,
क्या है वो व्यथाएं जो मन को अशांत करती हैं,
किसे कहूं कि बैठो और सुनो,
जो कथाएं मुझको आक्रान्त करती हैं ?

कुछ नहीं है बताने को पर कुछ तो है कहीं,
जो किसी फांस के चुभने जैसा है, 
मन के किसी कोने में ज़रूर है कोई बात,
जो शायद किसी आस के टूटने जैसा है.

कैसे ढूँढूं उस बात को कि डर है और उलझ जाने का, 
कि जैसे एक मायाजाल में फंसते जाना है,
मन के सवालों का अगर जवाब देने की ठानी, 
तो जैसे खुद ही बवंडर के रस्ते में जाना है.

मगर कुछ उत्तर तो ढूँढने ही पड़ेंगे,
इससे पहले कि प्रश्न ही अर्थहीन  हो जाएँ,
कोई और नहीं बता सकेगा क्या है मन के अन्दर,
तो ढूँढने की कोशिश करते हैं स्वयं में लीन हो कर.

Wednesday, June 6, 2012

लम्हे बिताये जो मैंने चाँद के साथ

कल आधी रात में चाँद को खिड़की से झांकते देखा,
पूछा मैने कि क्या कोई और भी मेरी तरह नींद का तलबगार है?
मगर चाँद ने जवाब देने के बदले बादलों की ओट ले ली,
और मैं सोच में पड़ी कि और खिडकियों पे भी किसी को इंतज़ार है.

चाँद फिर बाहर निकला और यूँ लगा कि शायद वो शर्मीला है, 
तो मैने अपना मुँह फेर लिया ताकि वो थोड़ी देर तो रुके,
कि नींद के ना आने तलक  किसी का तो साथ चाहिए,  
और कोई नहीं था तो लगा चलो चाँद को ही तके.

फिर उसी तरह औंधे मुँह मैंने चाँद से बात करी, 
पूछा उससे कि सदियों से वो खिडकियों में झाँक रहा है,
क्या उसने नहीं देखा कि सब में एक सी ही खलिश है, 
क्या नहीं हर कोई कुछ ना कुछ माँग रहा है ?

किसी को तलाश है दौलत की ,
तो कोई एक रोटी का तलबगार है,
किसी को उम्मीद है शोहरत की,
तो कोई मर जाने को तैयार है.

मैंने चाँद से कहा कि एक मेरी भी कुछ अर्जियां है, 
ले जाओ गर पता हो कहाँ पहुंचानी है,
एक तो पहुंचा दो मेरे जैसे किसी तन्हा को कि आ के मिल जाए,
और एक उस को जिसने लिखी हम सब की कहानी है.

और भी बहुत बातें थीं पूछने को चाँद से,
और भी बहुत कुछ था बताने को, 
लेकिन शायद चाँद ने नींद से सांठ-गाँठ रखी थी, 
तो पलकों पे एक बोझ आया - बस उसी पल मुझे सुला जाने को.  

Thursday, May 10, 2012

आत्म-शक्ति

 जीवन में बहुत बार हमें लगता है अब बस-और  नहीं . कभी किसी पहाड़ी  पर चढ़ाई की है? जैसे जैसे ऊपर पहुँचते जाते हैं, पैरों को लगने लगता है कि उनपे पत्थर बाँध  दिए गए हैं , साँसों को लगने लगता है कि उनको रोकने की साज़िश  हो  रही है, दिल  को लगता है कि धड़कन और तेज़  हुई तो पूरी तरह रुक जाने का ख़तरा पैदा हो जाएगा..इन  सब  अंगों के सिग्नलों  के बावजूद , कुछ  तो है जो आगे बढ़ने का हौसला देता रहता है - आपने क्या सोचा ? वो दिमाग है? ना ना  - दिमाग  तो शरीर के सारे संकेतों को सुन  कर आपको रुक  जाने की सलाह देने लगता है। उसका काम  तो शरीर की रक्षा करना है ना? तो फिर क्या है जो कहता है "बस  थोड़ा सा और, ज़रा सा और बढ़ो, अब बस पहुँचने ही वाले हैं"..बस  उसी आवाज़  को सुन कर हम  आगे  बढ़ते जाते हैं ना ? और जब हम उस पहाड़ी के ऊपर पहुँचते हैं तो जो अनूभूति होती है, वो कैसे शब्दों में व्यक्त करूँ? एक उपलब्धि का अनुभव होता है - उस पल में हम सारी परेशानियों को भूल जाते हैं. और साथ ही उस आवाज़ को भी जो रास्ते भर साथ रही. 
         वो जीवन शक्ति कहाँ गयी? एक बार सोच के देखिए - वो कहीं बाहर नहीं है - आपके अंदर ही है. बस जीवन की चढ़ाई में हम उसकी आवाज़ सुनते नहीं हैं - बाहर के शोर पे जो सारा ध्यान रहता है. जब आप किसी पहाड़ी पर चढ़ रहे होते हैं, तो रास्ते में कितनी सारी चीज़ें मिलती हैं - नदी अपने रास्ते बह रही होती है, पेड़ पौधे अपनी जगह पे दोल रहे होते हैं, पंछी अपने खाने -दाने में व्यस्त होते हैं. आप ये सब देखते हैं और इन सब की सुंदरता को अपने मन में रख कर आगे बढ़ते हैं. आप नदी से ये तो अपेक्षा नहीं करते कि वो आपके साथ चलेगी, ना ही सोचते हैं की पेड़ अपने स्थान से हट जाएँगे. तो फिर हम ये अपेक्षा इंसानों से भी क्यूँ करते हैं? और जब वो अपेक्षा पूरी नहीं होती, तो हमें अपना जीवन व्यर्थ लगने लगता है. क्यूँ?
             ये जीवन एक यात्रा ही है - और इसमें बहुत लोग आते हैं और जाते हैं - कुछ जो आपके साथ लंबे समय तक चलते हैं और कुछ बस थोड़े समय के साथी हैं. लेकिन अंततः सब अपनी अपनी यात्रा ही कर रहे होते हैं. जो साथ हैं, उनके साथ के लिए और जो आगे बढ़ गये या पीछे छूट गये, उनके साथ बिताए अच्छे पलों के लिए धन्यवाद . ज़रा सोच के देखिए - क्या जीवन कभी रुकता है? वो तो बस एक नश्वर शरीर से दूसरे में जाता रहता है. और इसी तरह लाखों करोड़ों वर्षों से चल रहा है. हम और आप तो बहुत  छोटे हैं उसके आगे. तो फिर मानना पड़ेगा ना कि वो ही सर्वशक्तिमान है? और वही है ज़ो आपके साथ हमेशा रहती है - वो दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन कठिन पलों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा उसी से मिलती है - ठीक उस पहाड़ी पर चढ़ाई करने की प्रेरणा की तरह. तो फिर ध्यान से सुनिए  उसको - वो कह रही होगी कि "बढ़ो आगे - कोई हार मानने की ज़रूरत नहीं है, और आगे और भी सुंदर नज़ारे मिलेंगे, बस बढ़ते चलो". और बस इसी तरह आपकी यात्रा पूरी होगी.

Friday, November 7, 2008

मेरी रेल यात्रा

इस बार दीवाली कि छुट्टी के बाद मैं भारतीय रेल के भ्रमण का आनंद ले(या दुख झेल)रही थी। मुझे तीन दिन तीन अलग-अलग रेल गाडियों में सफ़र करना था मगर, अक्सर की तरह कोई भी गाडी समय पर नहीं थी - जैसे कि समय पर होना एक राष्ट्रीय अपराध हो।
अंग्रेज़ी में "IST" का मतलब होता है "Indian Standard Time" पर उसका ज़्यादा सही मतलब निकलता है - "Indian Stretchable Time"।
पर एक बात माननी होगी कि इतनी बडी जनसंख्या और आकार वाले देश में इतना सस्ता जन-यातायात का साधन होना एक बहुत बडी उपलब्धि है।
परंतु ये और भी अच्छा होगा जिस दिन सारी रेल गाडियां समय पर चलने लगेंगी। वो कहते हैं ना "ये दिल मांगे मोर"!
तो पहले स्टेशन पर इंतज़ार करते हुए मुझे मेरी मां ने एक बडा मज़ेदार किस्सा बताया जो कि उंहोने दार्जीलिंग जाते हुए सुना था। उनकी गाडी का नाम था "महानंदा एक्स्प्रेस"।वो गाडी करीब ८ घंटे देरी से चल रही थी। एक और परिवार भी उनके बगल में इसी गाडी के इंतज़ार में बैठा था, जिसमें एक छोटी बच्ची थी - जो कि बहुत दुखी हो चुकी थी। उस बच्ची के मुंह से बडा सही उदगार निकला - "इसका नाम महानंदा एक्स्प्रेस नहीं - महागंदा एक्स्प्रेस होना चाहिये"!
खैर राम राम करते उस गाडी से हम अगले गंतव्य पे पहुंचे। उसके बाद वाली गाडी में हालांकि हमने तीन महीने पहले ही आरक्षण करवा लिया था लेकिन हमें केवल एक ही "बर्थ" मिल पायी। बाकी "वेटिंग लिस्ट" में ही रहीं। गाडी इतनी खचाखच भरी हुई थी कि "टी टी" ने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी पर वो अच्छा व्यक्ति था और उसने हमारी परेशानी को और नहीं बढाया और हमें उसी एक बर्थ पर यात्रा करने कि अनुमति दे दी (जबकि नियमनुसार यदि आपको आरक्षण ना मिले तो आप उस डिब्बे में यात्रा नहीं कर सकते)।
उस गाडी में "पैंट्री कार" से खाने पीने का सामान लाने वाला एक "वेटर" एक अलग अंदाज़ में अपना सामान बेच रहा था - वो ऐसे नहीं बोल रहा था "चिप्स ले लो" जैसे कि आमतौर पर विक्रेता बोलते हैं। उसका कहना था "हज़रत निज़ामुद्दीन से आया हूं, यशवंतपुर तक खिलाता जाउंगा। खाते रहो, मुस्कराते रहो। और संसार में है क्या?"।
बिल्कुल सही दार्शनिक विचार था कि "और संसार में है क्या"। अब मुझे नहीं लगता कि उसने चार्वाक दर्शन पढा होगा पर उसने भी वही बात बोली जो चार्वाक जी इतने वर्ष पूर्व लिख गये हैं।
कब किसके द्वारा आपको ज्ञान मिल जाये - आप अनुमान भी नहीं लगा सकते।
अब विक्रेताओं की बात निकली है तो मुझे एक पुराना किस्सा याद आ गया जब मैं एक बार बैंगलोर से दिल्ली की ओर जा रही थी। तो उस गाडी में सुबह पांच बजे से ही चाय-काफ़ी लेकर वेटर आ जाते हैं। अब पता नहीं क्युं वो जब "काफ़ी काफ़ी काफ़ी" बोलते हैं तो वो सुनाइ देता है "कापी कापी कापी"। तो एक बच्चा भी जाग रहा था (अब संयोग वश वो सरदार था जिनको लेकर इस देश में उसी प्रकार बहुत सारे किस्से होते हैं जैसे इंग्लैंड के लोग "स्कोट्स" के बारे में बनाते हैं)। तो उसने उस वेटर से सवाल पूछा - "लाइन वाली है कि बिना लाइन वाली?"। कहने कि आवश्कता नहीं है कि सुबह सुबह सबको "laughter therapy" मिल गयी।
इस यात्रा पर वापस आती हूं। तो अब हैदराबाद पहुंचने पर के बाद अगली गाडी मुझे बैंगलोर के लिये लेनी थी। वो यात्रा बिना किसी परेशानी के बीत गयी।
सिर्फ़ एक बात और बतानी रह गयी आप सब को - कि उसी एक समान के लिये जो मेरे पास था - एक प्लेट्फ़ोर्म से दूसरे पे जाने के लिये मुझे तीन कुलियों को भोपाल में २० रुपए, हैदराबाद में ३० और बंगलोर में ६० रुपए देने पडे - जबकि सबसे कम रास्ता बंगलोर वाले कुली को तय करना था। उस हिसाब से मुझे ऐसा लग रहा था कि बंगलोर की अपेक्षा बाकी जगहों के कुलियों के साथ मैंने नाइंसाफ़ी कर दी है - हालांकि वो सरकार द्वारा प्रति किलो के हिसाब से तय किये गये रेट के अनुरूप ही था। पर बंगलोर में एक अलिखित "बंगलोर शुल्क" लगता है जिसके बारे में नये आने वाले लोगों को तो पता ही नहीं होता है और इसलिये उनको ज़ोर का झटका लगता है वो भी ज़ोर से (उनको सलाह है कि साथ में मिरिंडा ले के चलें)।
बाकी बातें बाद में । तब तक के लिये "थोडा इंतज़ार का मज़ा लीजिये" - भारतीय रेल के लिये ये "लोगो" कैसा रहेगा - इस पर विचार करें ः-)।



Thursday, October 30, 2008

भारत एक यात्रा - युगों की

मैं जब भी टी वी पर भारतीय जीवन पर दिखायी जाने वाला कोई वृत्तचित्र देखती हूं तो मुझे हमेशा एक ही अनुभुति होती है।
वो ये कि पिछ्ले हजारों वर्षों से(चलिये हडप्पा कालीन सभ्यता के समय से)लेकर आज तक, हमारे रहने-सहने और सोचने-विचारने के ढंग में कितना नाम मात्र का परिवर्तन हुआ है।
अब चलिये विवेचना करते हैं कि ऐसा मुझे केवल प्रतीत होता है या वास्तव में ऐसा है।
पाठक कृप्या ये ध्यान रखें कि मैं किसी प्रकार से ये कह्ने की कोशिश नहीं कर रही हूं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। ये मात्र पुराने युग से आज के भारतीय जीवन शैली की एक तुलना करने का प्रयास है।
तो शुरुआत करते हैं पारिवारिक जीवन से। तब भी हमारे समाज में पाश्चात्य देशों के समान किसी प्रकार कि "सोशल सेक्योरिटि" कि व्यवस्था नहीं थी और आज भी नहीं है। तो कुल मिला के लोग पह्ले अपनी संतानों का पालन पोषण करते थे और बडे होने पर वो संतानें अपने माता पिता का। वही आज की भी सामाजिक व्यवस्था है।और शायद यही कारण है हमारे समाज में आज भी पुत्र-संतान की इच्छा रखने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। पुराने युग से ही भारतीय स्त्रियों को "पुत्रवती" होने का आशीर्वाद दिया जाता है जो कि इसी सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता है।
अब इस बात से आगे बढते हैं और अपने दिन प्रतिदिन के कार्यों पे दृष्टि डालते हैं। तो हमारी प्रातः तब भी सूर्य नमस्कार से होती थी और आज भी भारत के बडे शहरों में बसने वाले ना भी करते हों तो ग्रामीण-जन तो अवश्य ही इसी प्रकार दिन का आरम्भ करते हैं। बल्कि शहरों में रह्ने वालों में भी आजकल योग के प्रति रुचि जागृत होने के कारण, सूर्य-नमस्कार जैसी प्राचीन परम्परा जैसे फ़िर से जीवित हो उठी है।
इसके बाद ध्यान देते हैं अपने धर्म कर्म की ओर - तो जैसा कि वर्षों पूर्व था, उसी प्रकार हम आज भी प्रकृति की वस्तुओं की पूजा करते हैं। (अब यहां पर मैं इस बात को नहीं नकारूंगी कि भारत में हिंदू धर्म के लोगों की संख्या अभी भी सबसे अधिक है और धर्मों की अपेक्षा। तो हम आज भी गाय को, नदियों को, पीपल,तुलसी, यहां तक कि बंदर को पूजते हैं, जैसे कि तब, यहां तक कि पत्थर को भी शालिग्राम (ईश्वर)मानते हैं।
अधिकतर लोग अभी भी उतने ही धर्म भीरु हैं जितने कि तब रहे होंगे जब कि "पोक्स" जैसी बीमारी को देवी का प्रकोप मान कर उसे नाम दिया था "माता" - "चिकन पोक्स" यानि "छोटी माता" और "स्माल पोक्स" यानि "बडी माता"! चंद उदाहरण देती हूं - आज भी अधिकतर लोग रक्षासूत्र (कलावा) बंधवा कर स्वयम को हर विपत्ति से सुरक्षित समझते हैं(चाहे गाडी चलाते हुए हेल्मेट/सीट बेल्ट जैसी छोटी सी सावधानी भी ना ली हो)। यदि मंदिर से प्रसाद में फूल कि एक पंखुडि भी मिली हो तो उसे फ़ेंकने से डरते हैं कि कहीं कुछ अनिष्ट ना हो जाये (चाहे प्रसाद मिट्टी में गिर के गंदा हो जाये उसे भी पोंछ कर खा लेंगे कि प्रसाद है, लेकिन यदि सामान्य भोजन साफ़ जगह पे भी गिरा हो तो उसे "जर्म्स" के डर से फेंक देते हैं )।
अब एक दूसरे दृष्टिकोंण से इसे धर्म के प्रति गहरा विश्वास कहिये या अज्ञानता या फ़िर जीवन का फ़लसफ़ा - मगर उसी के सहारे यहां के लोग थोडे में भी संतोष रख कर, बडे से बडे दुख भी सह जाते हैं, जिनके कारण पाश्चात्य जगत में लोगों को "मेंटल ब्रेक्डाउन" तक हो जाता है। यदि आज किसी के पास खाने को नहीं है तो भी ऐसा बहुत ही मुश्किल होगा कि वो कल के बेहतर होने की आशा ना करें। लेकिन वहीं अगर "नाक कट" गयी (अर्थात सम्मान चला गया)तो वे आत्महत्या तक कर लेंगे। (इस "सम्मान" के विषय में मुझे अभी कुछ ही समय पह्ले पता चला है कि चीन के निवासियों का भी यही विचार है - कि नाक गयी तो सब गया।)
वास्तव में भारत में सामाजिक जीवन, मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन से अलग नहीं है। सामान्तः लोग जो भी करते हैं, उसमें सामाजिक अनुमति होना नितांत आवश्यक है। यदि कोई अपनी इच्छानुसार वो कार्य करना चाहे जो समाज द्वारा मान्य नहीं है तो उस व्यक्ति में बहिष्कृत हो कर जी सकने का दम भी होना चाहिये। वो भी एक अत्यंत जटिल कार्य है क्युंकि आप के साथ आपका परिवार जुडा होता है और सम्मान मात्र आपका नहीं जायेगा अपितु लोग आपके परिवार का भी लोग जीना मुश्किल कर देंगे।
लेकिन वहीं इसी सामाजिक व्यवस्था के कारण बहुत से ऐसे कार्य लोग नहीं करते जिनको करने के स्वयम पे ही दुष्परिणाम हों - और इस परिणाम में मैं सम्मान- निरादर की बात नहीं कर रही हूं।
अब आगे बढ्ते हैं अपने रोज़गार की ओर। तो आज भी भारत कृषि प्रमुख देश है।
त्योहारों को देखें तो अधिकतर त्योहार या तो रबी या खरीफ़ की फ़सल की कटाई के उत्सव हैं अथवा मौसम के बदलने के - उनके साथ चाहे कहानी कुछ भी जोड दी हो। जैसे कि पह्ले होता था वैसे ही आज भी विवाह के लिये मुहुर्त निकालते हैं तो वो या तो सर्दी की फ़सल के काटने के बाद का होता है अथवा गर्मी की फ़सल काटने के बाद का - क्युं? क्युंकि कृषि प्रधान देश में उसी समय लोगों के हाथ में धन और समय आता है। अब वो परम्परा में आ गया है जो कि पहले आवश्यकता थी।
इसी प्रकार यदि हम और भी कई छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दें तो हमें पता चलेगा कि हम वो आज भी क्युं करते जा रहे हैं जो युगों पहले का भारतीय किया करता था - जबकि उसकि आवश्यकता अब समाप्त हो चुकी है।
परंतु हम पुरानी व्यवस्था को तब तक चलाते रहते हैं जब तक कि उस से हमें कोई नुक्सान ना हो या फ़िर कुछ नया करने के लिये कोई और बहादुर ना कमर कस ले। हर विषय पर अधिकतर लोगों का विचार होता है कि हम तो सामान्य लोग हैं, हम क्युं अपने शांति से चल रहे जीवन में खलल डालें।
अब मैं ये कहने की स्थिति में नहीं हूं कि इसी कारण हम इतने वर्षों से आज तक बने हुए हैं। पर हो सकता है कि ये भी एक कारण हो!
अगली प्रस्तुति तक - सोचते रहिये ।